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Showing posts from February, 2019

सोनू वालिया

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  19 फरवरी 1964 को नई दिल्ली में जन्म हुआ था  सोनू वालिया का।   फ़िल्मी दुनिया की चंद पढ़ी लिखी अभिनेत्रियों में नाम शामिल हैं सोनू वालिया का। सोनू वालिया ने  पत्रकारिता में पीजी करने के बाद उन्होंने साइकोलॉजी में भी डिग्री हासिल की थी। 2017 में वे एक बार फिर चर्चा में तब आयी जब उन्होंने पुलिस में अज्ञात शख्स के खिलाफ अश्लील फ़ोन कॉल्स करने और वीडियो भेजने की शिकायत दर्ज कराई थीं।  1982 में तहलका से सोनू वालिया ने शुरुआत की थी। 1986 शर्त,1988 आकर्षण खून भरी माँग,1989 क्लर्क,महादेव,1990 तेजा,हातिमताई महासंग्राम, 1991 हक रुपये दस करोड़ दलपति खेल प्रतिकार नम्बरी आदमी 1992 निश्चय दिल आशना है 1993 साहिबाँ 1995 जल्लाद और 2001 में आई कसम में आखिरी बार दिखाई दी थी। ‘खून भरी मांग’ में सोनू वालिया ने बोल्ड किरदार निभाया था इसके बाद तो बोल्ड किरदार करना हिंदी सिनेमा का हिस्सा बन गया। ‘खून भरी मांग’ से उन्हें काफी सुर्खियां मिली। सोनू को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला। सोनू वालिया कभी लीड एक्ट्रेस के तौर पर सफल नहीं हो पाई। पढ़ाई पूरी ...

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने ..

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जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने .. उमराव जान की वो भावपूर्ण ग़ज़ल   खय्याम साहब और फिल्मी ग़ज़लों के उस छोटे परंतु स्वर्णिम दौर की बात हो रही हैं जिसमें दो तीन सालों के बीच बाजार, उमराव जान और अर्थ जैसी फिल्में अपने अलहदा संगीत की वज़ह से जनमानस के हृदय में अमिट छाप छोड़ गयीं। डिस्को संगीत और मार धाड़ वाली फिल्मों के उस दौर में जब मुजफ्फर अली ख़य्याम साहब के पास लखनऊ की मशहूर तवायफ़ उमराव जान की पटकथा सामने लाए तो उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया। मुजफ्फर अली ख़य्याम से पहले जयदेव को फिल्म के लिए बात कर चुके थे और संगीतकार जयदेव ने लता से फिल्म के गीत गवाने का निश्चय भी कर लिया था। पर होनी को तो कुछ और मंज़ूर था । पारिश्रमिक के लिए बात अटकी और फिल्म ख़य्याम की झोली में आ गिरी। फिल्म की  कहानी के अनुरूप ग़ज़लों को लिखने के लिए एक ख़ालिस उर्दू  शायर की जरूरत थी। लिहाज़ा  उसके लिए शहरयार साहब चुन लिए गए। पर इन ग़ज़लों को गाने के लिए आशा जी को चुनना थोड़ा चौंकाने वाला जरूर था।  आशा जी उस दौर तक चुलबुले, शोख़ गीतों के लिए ही ज्यादा जान...
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सुर सम्राज्ञी लता और मोहम्‍मद रफी ने सिनेमा जगत को कई सुपरहिट गानें दिए हैं। लता मंगेशकर ने रफी के साथ ही सबसे ज्‍यादा गानें गाए हैं। आ जा के इंतजार में जाने को हैं बहार भी  शंकर जयकिशन, हलाकू (1956)  आदमी मुसाफिर हैं, आता हैं जाता हैं  आनंद बक्षी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, अपनापन (1977)  आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया  मजरुह सुलतानपुरी, रोशन, आरती (1962)  आशाओं के सावन में, उमंगों की बहार में  आनंद बक्षी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आशा (1980)  आवाज दे के हमे तुम बुलाओ  हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, प्रोफेसर (1962)  अगर मैं पूछू जवाब दोगे  फारुख कैसर, शिकारी (1963)  बेखुदी में सनम उठ गए जो कदम  कल्याणजी आनंदजी, हसीना मान जायेगी  भूला नही देना जी भूला नही देना  नौशाद, बारादरी (1955)  चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो  कैफी भोपाली, गुलाम मोहम्मद, पाकिजा (1971)  चाँद जाने कहा खो गया, तुम को कोहरे से पर्दा हटाना ना था  राजेन्द्र कृष्ण, चित्रगुप्त, मै चूप रहूंगी (1962) ...
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''परिचय'- (1972 ) 20 अक्टूबर 1972 को रिलीज़ हुई गुलज़ार की फिल्म 'परिचय 'एक नौजवान शिक्षक रवि ( जीतेन्द्र ) की कहानी है जो बच्चो को अपने गाँव से विशेष रूप से पढ़ाने आते है ....राय साहेब ( प्राण ) इन बच्चो के दादा है ,ये बच्चे अपनी शरारतो से किसी भी शिक्षक को अपने घर पर टिकने नहीं देते लेकिन रवि इन बच्चो को न केवल सुधारता है बल्कि उन्हें शिक्षित भी करता है .......इस फिल्म में मुख्य भूमिका जीतेन्द्र ,जया भादुड़ी , प्राण ,ऐ.के हंगल, असरानी ,गीता सिद्धार्थ ,और लीला मिश्रा ने निभाई थी विनोद खन्ना और संजीव कुमार गेस्ट रोल में थे , इसी वर्ष ही आई गुलज़ार की एक अन्य फिल्म 'कोशिश 'में संजीव कुमार जया भादुड़ी के पति बने थे जबकि 'परिचय 'में वो जया भादुड़ी के पिता बने थे .......गुलज़ार साहेब बंगाली उपन्यासो पर फिल्मे बनाने के लिए मशहूर है यह फिल्म भी बंगाली उपन्यास,, Rangeen Uttarain पर आधारित थी जिसे आर.के मित्रा ने लिखा था लेकिन कुछ फ़िल्मी आलोचक इसे आंशिक रूप से 1965 की हॉलीवुड फिल्म 'द साउंड ऑफ म्यूजिक ' से प्रेरित भी बताते है 'परिचय 'को गुलज़ार ...

संगीत में सुकून की बात हो तो ख़य्याम याद आते हैं

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ख़य्याम ने दूसरों के मुकाबले कम फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन जिनमें भी दिया वे मील का पत्थर हो गईं. उन्होंने बॉलीवुड को पंजाबी संगीत से भी रूबरू कराया आदित्य शर्मा चर्चित लेखक और सिनेमा के विद्वान यतींद्र मिश्र ने ‘लता सुर गाथा’ में लता मंगेशकर जी से पूछा कि उनका गाया कौन सा गाना है जिसे वे नूरजहां की आवाज़ में सुनना चाहेगीं. उन्होंने कहा, फ़िल्म रज़िया सुल्तान’ का ‘ऐ दिले नादां’. सोचिए, वे लता मंगेशकर जिनका फ़िल्म संगीत पर एकतरफ़ा प्रभुत्व रहा है, जिनके पास एक से एक नायाब गाने हैं, वे जिनके ज़रा सा आंखें तरेर देने पर प्रोडूसर और संगीतकार की सांसें रुक जाया करती थीं. जो संगीतकार मदन मोहन को अपना भाई मानती थीं, जो रोशन लाल जी को अपनी फ़िल्म ‘भैरवी’ के लिए बतौर संगीतकार लेना चाहती थीं, जिन्हें खेमचंद प्रकाश ने आकाश पर बैठाया, वे इन सबको छोड़कर ‘रज़िया सुल्तान’ के मौसिकीकार मोहम्मद ज़हूर हाशमी ‘ख़य्याम’ साहब का गाना चुनें तो अपने आप में यह ख़य्याम के परिचय से कम नहीं है. हालांकि इसके अलावा भी काफ़ी कुछ और है जो मोहम्मद ज़हूर को ‘ख़य्याम’ बनाता है. पहले यह गाना सुन लिया जाए, फिर आगे बढ़ते है...
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 निम्मी हिंदी  फि़ल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में  रही हैं। उनका असली नाम ‘नवाब बानू है। बॉलीवुड की इस मासूम-सी ख़ूबसूरत अभिनेत्री का राज कपूर ने फि़ल्मी दुनिया से परिचय करवाया था। हालांकि निम्मी की फि़ल्मी शुरुआत सहायक अभिनेत्री के तौर पर राज कपूर और नर्गिस अभिनीत फि़ल्म ‘बरसात 1949 से हुई थी। दिलचस्प बात तो यह भी है कि इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री पर राज कपूर की नजऱ उस समय पड़ी, जब वे एक फि़ल्म की शूटिंग देख रही थीं। निम्मी अपनी समकालीन नायिकाओं मधुबाला, नर्गिस, नूतन, मीना कुमारी, सुरैया और गीता बाली के समान ही प्रतिभाशाली थीं। निम्मी ख़ूबसूरत आँखों वाली सम्मोहक अभिनेत्री मानी जाती हैं। फि़ल्म में उनकी भूमिका को कभी भी सहनायिका के रूप में नहीं लिया गया। उन पर बहुत-सी फि़ल्मों के यादगार गीत फि़ल्माए गए थे। निर्देशक के. आसिफ़ की फि़ल्म ‘लव एंड गॉड उनकी आखिरी फि़ल्म थी ।                                           निम्मी का जन्म 18 फऱवरी, 1933 को आगरा मे...
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Dr Vidya  (1962) was a film with Vyjayanthimala and Manoj Kumar in lead roles and had wonderful music by Sachin Dev Burman.  This one also has playback by Lata Mangeshkar and on screen it is Vyjayanthimala. Lyrics are by Majrooh Sultanpuri.   जानि तुम तो डोले दगा दे के जानि तुम तो डोले दगा दे के जय हो जुलमी नैना कहा लेके हो जानी बदले बदले रुठे रुठे तुम तो हो जी पिया बचपन के जूते बदले बदले रुठे रुठे तुम तो हो जी पिया बचपन के जूते इतना जणू पर न मनु जियरा जाये पर लगी नहीं छूते जानि तुम तो डोले दगा दे के
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Dr Vidya  (1962) was a film with Vyjayanthimala and Manoj Kumar in lead roles and had wonderful music by Sachin Dev Burman.  This one also has playback by Lata Mangeshkar and on screen it is Vyjayanthimala. Lyrics are by Majrooh Sultanpuri.   जानि तुम तो डोले दगा दे के जानि तुम तो डोले दगा दे के जय हो जुलमी नैना कहा लेके हो जानी बदले बदले रुठे रुठे तुम तो हो जी पिया बचपन के जूते बदले बदले रुठे रुठे तुम तो हो जी पिया बचपन के जूते इतना जणू पर न मनु जियरा जाये पर लगी नहीं छूते जानि तुम तो डोले दगा दे के

कहाँ हैं शोमा आनंद ?

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”मुझे पीने का शौक नहीं…पीती हूं गम भूलाने को”, ये गाना  1983 में आई सुपरहिट फिल्म ‘कुली ’ का है। इस गाने में सिर पर लाल रंग का कपड़ा बांधे, हाथ में शराब की बोतल लिये, झूमती हुई  लड़की अपने बचपन के खोये हुए आशिक को ढूंढती है वो लड़की थी शोमा आनंद। वो औरत जिसने अपनी दमदार निगेटिव बहू के अभिनय से उन सासों को इतना प्रभावित किया कि वे अपनी बहुओं पर शक करने लगीं थीं। शोमा आनंद 80 के दशक की बेहतरीन अदाकारा रहीं हैं। शोमा आनंद का जन्म 16 फरवरी, 1958 में अमृतसर,में हुआ था।शोमा ने अपने करियर की शुरुआत 1976 में हिन्दी फिल्म बारूद से की थी। इस फिल्म में उनके अभिनेता ऋषि कपूर थे। इसमें वे लीड एक्ट्रेस थीं और फिल्म काफी सफल रही।इसके बाद 1980 से 1990 तक बहुत सी फिल्मों में सपोर्टिंग एक्ट्रेस के रूप में पर्दे पर आयीं। उसके बाद कभी मां, कभी भाभी तो कभी खलनायिका बनकर लोकप्रिय रहीं।फिल्म बारूद की सफलता के बाद उन्होंने एक बार फिर लीड एक्ट्रेस बनकर 1980 में आई फिल्म पतिता में आईं। इस फिल्म में उनके अपोज़िट मिथुन चक्रवर्ती थे। शोमा आनंद ने 90 के दशक में आये सीरि...

लाजवाब था आईएस जोहर का सेंस आफ ह्यूमर

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  एक लफ्ज़ है – हरफ़न मौला. इस एक लफ्ज़ को अगर किसी नाम में बदला जाए तो एक नाम हो सकता है   आईएस जोहर. पूरा नाम इन्द्र सेन जोहर. पैदाइश : पंजाब के चकवाल जिले की तलागंग तहसील (अब पाकिस्तान में)16 फरवरी 1920 को.  सबसे पहले एक मशहूर फ़िल्म कलाकार, जो कभी फ़िल्म का हीरो तो कभी हास्य अभिनेता की तरह पर्दे पर नज़र आता. लेकिन पर्दे से परे वे लेखक,निर्माता-निर्देशक भी थे. असल में उनके फ़िल्मी सफर की शुरूआत ही प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक रूप के शोरी की फ़िल्म ‘एक थी लड़की’ के लेखक के तौर पर ही हुई. इसी फ़िल्म में हास्य अभिनेता मजनू के साथ जोड़ी बनाकर एक भूमिका भी निभाई. अगले 35 बरस तक जोहर पर्दे पर लगातार छाए रहे. ➡️दो एमए और एलएलबी दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना, जॉय मुखर्जी जैसे कई सितारों के साथ हास्य भूमिकाओं के अलावा किशोर कुमार के साथ ‘बेवक़ूफ’(1960), ‘अकलमंद’(1966) और ‘श्रीमान जी’ (1968) और महमूद के साथ ‘जोहर-महमूद इन गोआ’ (1965), ‘जोहर-महमूद इन हांगकांग’ (1971) में जोड़ी बनाकर मुख्य भूमिकाओं में भी काम किया. अपनी फ़िल्म ‘जोहर-महमूद इन गोआ’ की ...

रणधीर कपूर

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रणधीर कपूर बॉलीवुड के  अभिनेता हैं  इनका  का जन्म 15 फरवरी 1947 को बम्बई (अब मुम्बई ) में हुआ था। वह बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता राज कपूर और कृष्णा कपूर के सबसे बड़े बेटे हैं। अपने पिता राज कपूर द्वारा स्थापित आर के स्टूडियो के प्रमुख (मालिकों में से एक ) हैं। 1972 में इन्होंने उस समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री बबिता से शादी कर ली और इनकी दो बेटियां करीना कपूर और करिश्मा कपूर हैं। इनकी दोनो बेटियां बॉलीवुड में अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। कई साल से रणधीर कपूर और बबिता दोनों एक दूसरे से अलग रह रहे हैं । 1971 में रणधीर कपूर की पहली फिल्म कल आज और कल, सुपर हिट हुई थी । इस फिल्म के बाद निर्देशक मनमोहन देसाई द्वारा निर्मित रामपुर का लक्ष्मण, जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा और रेखा शामिल थे एवं जया बच्चन के साथ जवानी दिवानी, दोनों फिल्में सुपरहिट रहीं। रणधीर कपूर की कुछ अन्य प्रसिद्ध फिल्मों में पोंगा पंडित,मामा भांजा, चाचा भतीजा, खलीफा, हाथ की सफाई, कसमे वादे, बीवी ओ बीवी और पुकार शामिल हैं। अभिनेता के रूप में वह सामान्य तरीके से सफल रहे। रणधीर कपूर ने खजाना फिल्म के...

जब सुरैया की आवाज सुनकर भावुक हो गए थे पंडित जवाहर लाल नेहरू

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1954 में प्रदर्शित हई फिल्म 'मिर्जा गालिब' में सुरैया ने नवाब जान का किरदार निभाया था जो शायर मिर्जा गालिब से बेहद प्यार करती है. इस फिल्म में मिर्ज़ा गालिब की पांच गजलों को सुरैया ने अपनी आवाज दीथी. जिस वक़्त सुरैया ने यह ग़ज़ल गाया था उस वक़्त उनकी आवाज में ही नहीं बल्कि उनकी आंखों में भी कुछ अलग था जो भी उनकी आँखों को देखता उसमें कैद हो जाता.  इसलिए जिस किसी ने भी सुरैया की आवाज सुनी वो उनका कायल हो गया. जिस वक़्त ये फिल्म आयी थी, उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे. उन्होंने भी इस फिल्म में सुरैया की गाईं यह गजलें सुनी थीं. इन्हें सुनने के बाद वह भी सुरैया की आवाज और अदायगी के दीवाने हो चुके थे. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस बात का खुलासा एक समारोह में भी किया था. जब सुरैया उनसे मुलाकात हुई तो नेहरु ने सुरैया से कहा था तुमने गालिब की रुह को जिंदा कर दिया. सुरैय्या की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी एक झलक पाने के लिए उनके चाहने वाले मुंबई में उनके घर के सामने घंटों खड़े रहते थे और उनके एक दीदार का इंतज़ार करते. सुरैया ने 31 जनवरी 200...
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   1962 की एक फ़िल्म 20 साल बाद के एक गाने को रेकोर्ड करने के लिये लता को आना था,मगर वो हो गयीं बीमार ! फ़िल्म के म्यूजिक डाइरेक्टर हेमंत कुमार गीत रेकोर्ड करने के लिये तैयार थे ! सभी रेडी थे,पर लता रिकोर्डिंग पर नही आयीं !     लता जी सुबाह सो कर उठीँ तो उन्हे लगा की तबियत ठीक नही है ! पेट गड़बड़ था , धीरे धीरे हालत बिगड़ने लगी , अचानक वोमिट होने लगा ,ग्रीन ग्रीन स्टफ निकलने लगा  ! डाक्टर बुलाया गया ,बहुत कमज़ोरी आ गयी थी ! जांच मे जो पता चला उस से डाक्टर परेशान हो गये,जब पूछा तो पता चला की इन्हे स्लौ पोइजन दिया जा रहा है !      ओर ये निर्णय लिया गया की उषा जी ही दीदी के लिये खाना बनायेन्गी ओर कोई रसोई मे नही जायेगा ! पहले बनाता था कूक ! वो दिखाइ नही दिया,बहुत ढूँढा पर नही मिला,ना ही वो अपनी पगार लेने आया, जिससे यही माना गया की ज़रूर किसी ने लता के खिलाफ़ साज़िश रची होगी ओर इस कूक को लगाया होगा !     इस ट्रैजिडी के बाद लता जी को वापस रिकवर होने मे पूरे तीन महीने लग गये ! घर पर ही इलाज होता रहा ! इस दौरान उनके एक दोस्त ने उनका बहुत साथ द...