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Showing posts from January, 2019

परदे के 'कृष्ण' की झलकियां

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बड़े परदे से लेकर छोटे परदे पर कई अभिनेताओं ने कृष्ण के रूप को साकार किया है। इनमें से कुछ ने तो कृष्ण के रूप को हमारे मन में स्थापित कर दिया है, तो कुछ सिर्फ परदे तक ही सिमट कर रह गए। आज कृष्ण जनमाष्टमी के अवसर पर सिने चिट्ठा आपके लिए लाया है, ऐसे ही कृष्ण की झलकियां।    कृष्ण का नाम आते ही कुछ शक्लें उभरती हैं, जैसे नितिश भारद्वाज, सर्वदमन बनर्जी और स्वपनिल जोशी। इनके अलावा भी कई कलाकारों ने कृष्ण के चरित्र को परदे पर साकार किया है।  कोई बीआर चोपड़ा का कृष्ण है, तो कोई रामानंद सागर का, तो कोई एकता कपूर का कृष्ण बना।  परदे के इन कृष्णों के बारे में आइए विस्तार से जानते हैं... एनटी रामाराव तेलुगू के बड़े अभिनेताओं में से एक एनटी रामाराव ने तकरीबन 17 फिल्मों में भगवान कृष्ण की भूमिका निभाई थी। कृष्ण की भूमिका वाली बेहतरीन फिल्मों की बात की जाए, तो साल 1962 में आई 'श्रीकृष्णार्जुनयुद्धम', साल 1964 में आई तमिल फिल्म 'कर्नन' और साल 1977 में आई 'दानवीर सूर कर्ण' गिनी जाती हैं। फिल्मों के बाद एनटी ने राजनीति के क्षेत्र में चले गए और साल 1982 ...
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तीन तलाक मुद्दे पर बनी फिल्म ‘निकाह’ का नाम रिलीज़ से ऐन पहले ही बदला गया। बी आर चोपड़ा की साल 1982 में आई फिल्म ‘निकाह’ का नाम पहले ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ था, लेकिन इसे रिलीज़ के ऐन पहले ही बदल दिया गया। यहां तक कि फिल्म को रिलीज़ से पहले रातोंरात मौलवियों को बुलाकर भी दिखाया गया था। राज बब्बर, सलमा आग़ा और दीपक पराशर की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘निकाह’ ‘तीन तलाक़’ के मुद्दे पर आधारित थी। इसे अचला नागर ने लिखा था। अचला नागर ने एक पोर्टल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि फिल्म ‘निकाह’ का नाम ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ था, लेकिन किसी निर्माता ने पहले ही अपनी फिल्म के लिए ये नाम रजिस्टर करवा लिया था। इस वजह से इसका नाम बदलना पड़ा। इसी से जुड़ा एक क़िस्सा बताते हुए अचला ने बताया कि चरित्र अभिनेता ने इस फिल्म के पहले नाम पर चुटकी लेते हुए बी आर चोपड़ा से कहा था कि अच्छा किया, जो आपने नाम बदल दिया। वरना हम बीवी से कहते चलो ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ देखने तलते हैं और हमारा फिल्म देखने से पहले ही तलाक़ हो जाता। बता दें कि इस फिल्म कहानी एक ऐसी मुस्लिम औरत नीलोफर की थी, जिसका पति वसीम उसे त...
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    देव ( देव आनंद ) के जीवन में आने वाली सबसे पहली युवती नंदा ( नंदा ) जो उसके जीवन में तब से है जब वह एक बेरोजगार युवक के रूप में बम्बई में उसी लॉज में ठहरा था जहा नंदा पहले से ठहरी हुयी थी। देव और नंदा में समय के साथ नजदीकियां बढ़ने लगती हैं पर इसी के साथ साथ देव की पहचान दो अन्य युवतियों, कल्पना ( कल्पना ) और सिमी ( सिमी ग्रेवाल ) से भी हो जाती है और वे दोनों भी देव के बेहद करीब आ जाती हैं| देव तीनों के ही नजदीक है पर उसका ध्यान एक कवि के रूप में अपने को स्थापित करने में ज्यादा है जबकि तीनों ही युवतियां चाहती हैं कि देव उनसे प्रेम-निवेदन करे| आर्थिक रूप से नंदा ही सबसे कमजोर है और वह यही समझती रही है कि उसी जैसी आर्थिक पृष्ठभूमि वाला देव उसी से प्रेम करता है और उसे ऐसा भी कोई संकेत नहीं मिलता देव से कि उसका ऐसा सोचना गलत है| वह देव के प्रेम निवेदन न करने से परेशान हो जाती है और व्याकुलता में एक पिकनिक पर देव के साथ जाती है यह सोचकर कि वहाँ तो देव उसके प्रति प्रेम का इजहार कर ही देगा| देव से वह किसी न किसी बहाने से उसके दिल की बात पूछना चाहती है और जब बातचीत ...
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भारत में मिस्टर भारत का योगदान    जब हैण्डसम, टॉल, स्मार्ट हरिकिशन गोस्वामी मुंबई में आये, तो उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि वह एक दिन न केवल एक स्टार, या एक प्रमुख फिल्म निर्माता के रूप में जाने जाएंगे और वह निश्चित रूप से कल्पना नहीं कर सकते थे कि वह मिस्टर भारत के रूप में जाने जाएगे, और राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्री और धार्मिक नेता उनकी सलाह लेंगे, इसके अलावा जनता उन्हें वास्तविक भारतीय या भारत वासी के चेहरे के रूप में स्वीकार करेगी, लेकिन वह सब जो वह सोच भी नहीं सकते थे वह समय बीतने के साथ सच हो गया! हरिकिशन को धर्मेंद्र और शशि कपूर जैसे अन्य संघर्षकारियों के साथ संघर्ष करना पड़ा था और स्टूडियो के पत्थर की बेंच पर दिन और रातें बिताई थी और कुछ काम मिल भी गया था, भले ही वह एक जूनियर कलाकार के रूप में हो। यह हरिकिशन थे जिन्होंने कई अन्य संघर्षरत अभिनेताओं के अलावा शशि और धर्मेंद्र में आत्मविश्वास पैदा किया। हरिकिशन ने भट्ट भाईयों, शंकरभाई भट्ट और विजय भट्ट (महेश भट्ट के चाचा) से फेवर लिया। उन्होंने उन्हें अपनी फ़िल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ दीं, ‘हरियाली और रास...
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    गाने नहीं डायलॉग्स के कैसेट आए🎞️ हिंदी फिल्म इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ था कि किसी फिल्म के गानों के बजाय उसके डायलॉग्स के कैसेट बाज़ारों में आए। कहा जाता है कि उस दौर में चाय के ठेलों से लेकर पान की गुमटियों पर ‘जो डर गया, समझो वो मर गया?’, ‘कितने आदमी थे?’, ‘तेरा क्या होगा कालिया?’ जैसे डायलॉग्स ही गूंजा करते थे। वहीं यह पहली फिल्म थी, जिसके पटकथा लेखकों को सितारा हैसियत हासिल हुई थी।  ➡️यादगार किरदारों की भरमार  किसी सफल फिल्म के एक या दो किरदार ही दर्शकों के ज़ेहन में रह जाते हैं, लेकिन ‘शोले’ उन फिल्मों में से हैं, जिसके सभी किरदार दर्शकों के मन पर छपे हैं। कई कलाकरों की पहचान इस फिल्म में निभाये किरदार ही बन गए।  ‘जय-वीरू’, ‘ठाकुर’, ‘गब्बर’, ‘बसंती’ और उसकी घोड़ी ‘धन्नो’ तक दर्शकों को याद रह गए। छोटी भूमिका के बाद भी ‘कालिया’, ‘सांभा’, ‘जेलर’, ‘सूरमा भोपाली’ याद हैं। कलाकारों पर यह किरदार इस तरह छाप छोड़ गए कि अगला-पिछला सब धरा रह गया और यह किरदार उनकी पहचान बन गए।  एक साक्षात्कार में ‘सांभा’ का किरदार निभाने वाले मैक म...
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मेल कराती मधुशाला    हरिवंश राय बच्चन हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध कवि और लेखक थे। इनकी प्रसिद्धि इनकी कृति मधुशाला के लिये अधिक है। 27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद,में जन्मे हरिवंश राय बच्चन हिन्दू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं। यह प्रताप नारायण श्रीवास्तव और सरस्वती देवी के बड़े पुत्र थे। इनको बाल्यकाल में बच्चन कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ बच्चा या संतान होता है। बाद में हरिवंश राय बच्चन इसी नाम से मशहूर हुए। 1926 में 19 वर्ष की उम्र में उनका विवाह श्यामा  से हुआ जो उस समय 14 वर्ष की थी। लेकिन 1936 में श्यामा की टी.बी के कारण मृत्यु हो गई। पाँच साल बाद 1941 में बच्चन ने पंजाब की तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने नीड़ का पुनर्निर्माण जैसे कविताओं की रचना की। तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए। अमिताभ बच्चन प्रसिद्ध अभिनेता हैं। तेजी बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन द्वारा शेक्सपीयर के अनुदित कई नाटकों में अभिनय किया है। हरिवंश राय बच्चन की शिक्षा इलाहाबाद तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में हुई। इन्होंने कायस्थ पाठशालाओं म...
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शहद सी मीठी आवाज़ की मल्लिका कविता कृष्णमूर्ति आज अपने 61 वें बसंत में प्रवेश कर रही हैं। इन दिनों कई नईं आवाज़ें संगीत की दुनिया में गूंज रही हैं, लेकिन कविता का वो सुरीला दौर आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। आठ साल की उम्र में गायिकी के लिए गोल्ड मेडल जीतने वाली कविता पद्मश्री से भी सम्मानित हैं। आइए, उनके जन्मदिन पर उनके संगीत के सफर पर नजर डालते हैं।      मेलोडी क्वीन कविता कृष्णमूर्ति के खाते में न जाने कितने ही खूबसूरत गाने दर्ज़ हैं। इनका जन्म दिल्ली में 25 जनवरी 1958 को अय्यर परिवार में हुआ था। जन्म के समय इनका नाम शारदा कृष्णमूर्ति था। इनके पिता शिक्षा विभाग में अधिकारी थे और घर में पढ़ाई पर काफ़ी जोर दिया जाता था। लेकिन छोटी कविता को संगीत में विशेष रूचि थी। आलम यह था कि बचपन में रेडियो के पास ही बैठ जाया करती थीं और बड़े गौर से गाने सुना करती थीं।  वह रेडियो पर लता मंगेशकर और मन्ना डे के गाए गीत खूब गौर से सुनतीं और साथ-साथ गुनगुनाती थीं। उनकी इस दिलचस्पी को देखते हुए, उनको संगीत की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही शुरू कर दी गई। इसके बाद उन्होंने गु...
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नवीन निश्चल : सौम्य चरित्रों के अभिनेता 11 April 1946 को जन्में अभिनेता  नवीन निश्चल उस समय जीवन का परित्याग ( 19 March 2011)  कर गये जब एक अभिनेता के रुप में हिन्दी सिनेमा उनका बहुत अच्छा उपयोग कर सकने की स्थिति में पहुँच गया था| आज के दौर में भानी-भांति की फिल्में हिंदी सिनेमा में बन रहे हैं और पुराने दौर से अलग आज के दौर में बुजुर्ग अभिनेता विविधता भरी भूमिकाएं पा रहे हैं और वे केवल चरित्र अभिनेताओं के लिए आरक्षित घिसी-पिटी भूमिकाएं निभाने के लिए अभिशप्त नहेने हैं| जहाँ तक भूमिकाओं का सवाल है वर्तमान दौर में सत्तर के दशक के फिल्मी सितारे अपने अभिनय जीवन के बहुत अच्छे दौर से गुजर रहे हैं। भले ही वे अब फिल्मों के नायक न बनाये जाते हों पर उनमें से ज्यादातर अभिनेता, मुख्य भूमिकायें निभाने वाले युवा सितारों से फिल्म को अपने पक्ष में छीन रहे हैं। नवीन निश्चल  का फिल्मी जीवन मध्यमार्गी रहा। उनकी फिल्मी यात्रा हिन्दी सिनेमा में स्टारडम की प्रक्रिया का विश्लेषण करने के लिये अच्छी और उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करती है। न तो वे बहुत बड़े सितारे बन पाये और न ही कभी ऐसा हुआ ...
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इस सुपरहिट बी ग्रेड फिल्म में रेखा ने बिखेरे थे अपने जलवे रेखा आज भी उतनीही फिट अँड हेल्दी नजर आती हैं जितनी वे मिस्टर नटवरलाल से लेकर तो सिलसिला फिल्म में नजर आयीं, लेकिन, उनके करिअर की शुरूआत में एक ऐसी फिल्म में उन्होने एक तवायफ का हॉट रोल किया था जो की सुपरहिट रहा था लेकिन, इस फिल्म में आप शायद ही रेखा को पहचान पाएंगे।    रेखा  ने अपने करियर की शुरुआत सावन भादो फिल्म से की थी, मगर उनकी एक ऐसी फिल्म भी आयी जिसमें कई सीन में वे पूरी तरह से न्यूड नजर आयी थीं, ये एक लगभग बी ग्रेड फिल्म थी, इस फिल्म में सुनील दत्त लीड रोल में थे। इस फिल्म का नाम था प्राण जाए पर वचन न जाए। डाकू के रोल में सुनील दत्त और भरपूर एक्सपोज करती रेखा के पोस्टर्स ने उस वक्त काफी हंगामा मचाया था, इन पोस्टरों को देख कर दर्शक थिएटर में रेखा को देखने जा पहुंचे थे। सुनील दत्त के राजा ठाकूर के रोल से ज्यादा सुर्खियां बटोर गई रेखा। तवायफ के रोल में रेखा के लटको-झटकों ने फिल्म में रंग भर दिया। हालांकि, उस वक्त रेखा उतनी छरहरी नहीं हुआ करती थी, ये वो रेखा थी जो जरा ज्यादा ही मोटी थीं, लेकिन, ये...
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मुग़ल-ए-आज़म' बनाने वाले के.आसिफ़ के बारे में ये बातें नहीं जानते होंगे आप मुग़ल-ए-आज़म' जैसी मूवी बनाने के लिए जिस तरह की सोच, कल्पना, और जस्बे की ज़रूरत थी, वो सिर्फ करीमउद्दीन आसिफ़ यानी की के. आसिफ़ ही कर सकते थे. आपको ये जानकार हैरत होगी की के.आसिफ ने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ 2 फिल्में ही बनायीं एक थी 50 के दशक में बानी फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' और दूसरी 'फूल' लेकिन इन दोनों फिल्मों को बनाने में उन्होंने ने अपना सब कुछ लगा दिया. उनकी हर बात अलग थी वो एक चुटकी से सिगार की राख को झाड़ते थे.  के.आसिफ़ बॉलीवुड एक्टर नज़ीर के भतीजे थे. नज़ीर ने उन्हों फिल्मों में लाने की बहुत कोशिश की लेकिन बात नहीं बन पाई. यहाँ तक की नज़ीर ने उनके लिए दरजी की दूकान भी खुलवाई लेकिन के.आसिफ़ का दिल पड़ोस के दर्ज़ी की बेटी पर आ गया था और वो वहीँ मशरूफ रहने लगे जिसके चलते कुछ दिनों बाद दूकान को बंद करना पड़ा.  इन सब बातों से परेशान होकर नज़ीर ने आखिरकार उन्हें फिल्म निर्देशन की और धकेल दिया फिर क्या था उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा 1944 में आई 'फूल' और फिर 'मुग़ल-ए-आज़म. दो फ...