मुग़ल-ए-आज़म' बनाने वाले के.आसिफ़ के बारे में ये बातें नहीं जानते होंगे आप


मुग़ल-ए-आज़म' जैसी मूवी बनाने के लिए जिस तरह की सोच, कल्पना, और जस्बे की ज़रूरत थी, वो सिर्फ करीमउद्दीन आसिफ़ यानी की के. आसिफ़ ही कर सकते थे. आपको ये जानकार हैरत होगी की के.आसिफ ने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ 2 फिल्में ही बनायीं एक थी 50 के दशक में बानी फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' और दूसरी 'फूल' लेकिन इन दोनों फिल्मों को बनाने में उन्होंने ने अपना सब कुछ लगा दिया. उनकी हर बात अलग थी वो एक चुटकी से सिगार की राख को झाड़ते थे.

 के.आसिफ़ बॉलीवुड एक्टर नज़ीर के भतीजे थे. नज़ीर ने उन्हों फिल्मों में लाने की बहुत कोशिश की लेकिन बात नहीं बन पाई. यहाँ तक की नज़ीर ने उनके लिए दरजी की दूकान भी खुलवाई लेकिन के.आसिफ़ का दिल पड़ोस के दर्ज़ी की बेटी पर आ गया था और वो वहीँ मशरूफ रहने लगे जिसके चलते कुछ दिनों बाद दूकान को बंद करना पड़ा.

 इन सब बातों से परेशान होकर नज़ीर ने आखिरकार उन्हें फिल्म निर्देशन की और धकेल दिया फिर क्या था उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा 1944 में आई 'फूल' और फिर 'मुग़ल-ए-आज़म. दो फिल्में निर्देशित करने के बावजूद उनका नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों पर लिख दिया गया है.

ख़तीजा अकबर अपनी किताब 'द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला' में लिखती हैं, "शीश महल का सेट बनने में पूरे दो साल लग गए थे. के.आसिफ़ को इसकी प्रेरणा जयपुर के आमेर के क़िले में बने कांच के शीशमहल से मिली थी. उस समय भारत में उपलब्ध रंगीन शीशों की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं हुआ करती थी इसलिए उन्होंने बेल्जियम से इसे मंगवाया था."

मुग़ल-ए-आज़म अपने दौर की सबसे मंहगी और कामयाब फ़िल्म थी, लेकिन इसके निर्देशक के. आसिफ़ ने पूरी ज़िन्दगी एक किराए के घर में बिताया और टैक्सी पर चले.

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