गाने नहीं डायलॉग्स के कैसेट आए🎞️


हिंदी फिल्म इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ था कि किसी फिल्म के गानों के बजाय उसके डायलॉग्स के कैसेट बाज़ारों में आए। कहा जाता है कि उस दौर में चाय के ठेलों से लेकर पान की गुमटियों पर ‘जो डर गया, समझो वो मर गया?’, ‘कितने आदमी थे?’, ‘तेरा क्या होगा कालिया?’ जैसे डायलॉग्स ही गूंजा करते थे। वहीं यह पहली फिल्म थी, जिसके पटकथा लेखकों को सितारा हैसियत हासिल हुई थी। 

➡️यादगार किरदारों की भरमार 

किसी सफल फिल्म के एक या दो किरदार ही दर्शकों के ज़ेहन में रह जाते हैं, लेकिन ‘शोले’ उन फिल्मों में से हैं, जिसके सभी किरदार दर्शकों के मन पर छपे हैं। कई कलाकरों की पहचान इस फिल्म में निभाये किरदार ही बन गए। 

‘जय-वीरू’, ‘ठाकुर’, ‘गब्बर’, ‘बसंती’ और उसकी घोड़ी ‘धन्नो’ तक दर्शकों को याद रह गए। छोटी भूमिका के बाद भी ‘कालिया’, ‘सांभा’, ‘जेलर’, ‘सूरमा भोपाली’ याद हैं। कलाकारों पर यह किरदार इस तरह छाप छोड़ गए कि अगला-पिछला सब धरा रह गया और यह किरदार उनकी पहचान बन गए। 

एक साक्षात्कार में ‘सांभा’ का किरदार निभाने वाले मैक मोहन ने कहा था कि भले ही कुछ मनट के लिए मैं इस फिल्म में नज़र आया हूं, लेकिन मेरी यह पहचान बन गई और मैं काफी खुश हूं। 

वहीं ‘गब्बर’ बने अमज़द खान, उनके किए किरदारों में सबसे वजनी रहा। जगदीप ऐसे ‘सूरमा भोपाली’ बने की, उसके ही रह गए। लीला मिश्रा भी जगत ‘मौसी’ बन गईं। एके हंगल ‘रहीम चाचा’, तो केश्टो मुखर्जी ‘हरिराम नाई’ और असरानी ‘जेलर’ बन गए। 

इस फिल्म का जादू कुछ ऐसा है कि ख़त्म नहीं होता। बातों का सिरा खुलता है, तो फिर खुलता चला जाता है। ‘शोले’ को लेकर रमेश सिप्पी को कईयों ने कहा कि तुम दूसरी ऐसी फिल्म बनाते क्यों नहीं। अब भला कैसे समझाया जाए, ऐसी फिल्में बनाई नहीं जाती, बन जाती हैं। तभी तो यह उन फिल्मों में शुमार है, जिसे ‘न भूतो, न भविष्यति’ कहा जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने ..